लेखक: दीपाली
घने बादलों से ढकी एक सुबह, एक युवा खोजकर्ता लायरा ने दूर घाटी से आती एक अनजान धुन सुनी। हवा में एक अजीब-सी खामोशी थी — जैसे कोई उसे बुला रहा हो। वह अपने बैग में कंपास, नोटबुक और पानी की बोतल रखकर उस दिशा में चल पड़ी, जहाँ जंगल की छाया धुंध में गायब हो रही थी।
जैसे-जैसे वह अंदर गई, हवा ठंडी और नम होती गई। वहाँ के पेड़ साधारण नहीं थे — उनकी छाल से हल्की रोशनी की लहरें निकल रही थीं, मानो पेड़ सांस ले रहे हों। लायरा ने हाथ बढ़ाकर एक तने को छुआ — और उसी पल पेड़ ने फुसफुसाया, “सुनो… अगर तुम सच जानना चाहती हो, तो हमारे सवालों का जवाब दो।”
उसके पैरों के नीचे जमीन चमकने लगी। एक छोटा जुगनू-सा आत्मा उसके सामने आ गया — शरारती, पर दयालु। उसने कहा, “यह फुसफुसाता जंगल है। जो भी इसका रहस्य सुलझाता है, उसे वर्दांस का हृदय मिलता है — वह शक्ति जो जीवन और प्रकृति का संतुलन लौटाती है।”
लायरा ने गहरी सांस ली। “तुम्हारा पहला सवाल क्या है?” उसने पूछा।
पेड़ों की आवाज़ों ने मिलकर कहा — “जो सुन सकता है, वही जवाब देगा। जो याद रख सकता है, वही समझेगा। बताओ, मनुष्य ने पहली बार जंगल से क्या वादा किया था?”
लायरा की आँखें बंद हुईं। उसे बचपन की याद आई — जब उसने अपनी माँ से कहा था कि वह जंगलों की रक्षा करेगी। “वादा था — प्रकृति की रक्षा करने का,” उसने फुसफुसाया।
जंगल की रोशनी और तेज़ हो गई। जुगनू मुस्कुराया, “पहला उत्तर सही।”
उसके बाद उसने कई परीक्षाएँ दीं — भ्रम, अंधकार, अपने डर का सामना। हर बार जब वह सच्चाई चुनती, पेड़ों की चमक और बढ़ जाती।
अंत में, वह प्राचीन वृक्ष के सामने पहुँची — उसकी छाल पर अनगिनत रोशनियाँ धड़क रही थीं।
पेड़ ने कहा, “अंतिम सवाल — क्या तुम वह शक्ति केवल अपने लिए चाहोगी या संसार के लिए?”
लायरा ने बिना सोचे कहा, “संसार के लिए।”
पेड़ के भीतर से एक चमकता नीला दिलनुमा पत्थर निकला। “यह है वर्दांस का हृदय,” पेड़ ने कहा। “अब तुम हमारी भाषा समझ सकती हो — क्योंकि तुमने सुना, महसूस किया, और समझा।”
लायरा ने पत्थर को थामा। पूरा जंगल गुनगुनाने लगा। उसने महसूस किया कि अब हर पत्ता, हर हवा की सरसराहट उसे कुछ कह रही थी।
जब वह वापस निकली, जंगल फिर शांत था — लेकिन उसके भीतर वह फुसफुसाहट हमेशा के लिए बस चुकी थी।
समाप्त
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